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Detailed Sharada Chapter 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २ NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit
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Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २ NCERT Solutions PDF
वर्णोच्चारण-शिक्षा २ - प्रश्नोत्तर
Question 1. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत -
(क) वर्णानाम् उत्पत्यर्थं कति आवश्यकानि तत्त्वानि भवन्ति ?
(ख) कति स्थानानि सन्ति ?
(ग) आभ्यन्तर प्रयत्नः कतिविध: ?
(घ) करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृशति, तदा करणस्य कः प्रयत्नः भवति ?
(ङ) अवर्णस्य कति उपभेदाः सन्ति ?
(च) संवृत-प्रयत्नः कुत्र भवति ?
Answer:
(क) पञ्च (वर्णों की उत्पत्ति के लिए पाँच आवश्यक तत्त्व होते हैं।)
(ख) अष्टौ (उच्चारण के आठ मुख्य स्थान माने गए हैं।)
(ग) पञ्चविधः (आभ्यन्तर प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है।)
(घ) स्पृष्ट-प्रयत्नः (जब करण उच्चारण स्थान को पूरी तरह छूता है, तब स्पृष्ट प्रयत्न होता है।)
(ङ) अष्टादश (अ-वर्ण के कुल अठारह उपभेद माने गए हैं।)
(च) ह्रस्वस्य ‘अ’ वर्णस्य प्रयोगे (ह्रस्व 'अ' वर्ण के व्यावहारिक प्रयोग में संवृत प्रयत्न होता है।)
In simple words: इस प्रश्न में वर्णों के उच्चारण स्थानों, उनकी उत्पत्ति के आवश्यक तत्त्वों और प्रयत्नों (जैसे आभ्यन्तर और संवृत प्रयत्न) के बारे में संक्षेप में पूछा गया है।
Exam Tip: एकपदेन उत्तर लिखते समय केवल मुख्य उत्तर शब्द (जैसे पञ्च, अष्टौ, पञ्चविधः) ही लिखें, अनावश्यक रूप से पूरा वाक्य लिखने से बचें।
Question 2. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत -
(क) आभ्यन्तर - प्रयत्नः कः उच्यते ?
(ख) ईषत्स्पृष्ट- प्रयत्नः कदा भवति ?
(ग) करणस्य विवृत - प्रयत्नेन के स्वराः उच्चार्यन्ते ?
(घ) आभ्यन्तर प्रयत्नाः कुत्र दृश्यन्ते ?
(ङ) आभ्यन्तर - प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्टः स्वरः कः अस्ति ?
Answer:
(क) वर्णानाम् उच्चारणात् प्राक् मुखस्य आभ्यन्तरे यः यत्नः विधीयते, सः आभ्यन्तरप्रयत्नः कथ्यते। (वर्णों के उच्चारण से पूर्व मुख के भीतर जो चेष्टा या यत्न किया जाता है, उसे आभ्यन्तर प्रयत्न कहा जाता है।)
(ख) उच्चारणकाले यदा जिह्वा स्वस्थानं स्वल्पमात्रं स्पृशति, तदा ईषत्स्पृष्टप्रयत्नः निष्पद्यते। (जब उच्चारण करते समय जीभ अपने उच्चारण स्थान को बहुत कम छूती है, तब ईषत्स्पृष्ट प्रयत्न होता है।)
(ग) करणस्य विवृतप्रयत्नेन समस्तस्वराणाम् उच्चारणं क्रियते। (विवृत प्रयत्न के द्वारा सभी स्वरों का उच्चारण सम्पन्न किया जाता है।)
(घ) वर्णानाम् उत्पत्तिकालिकाः आभ्यन्तरप्रयत्नाः मुखकुहरस्य अन्तरे एव संलक्ष्यन्ते। (वर्णों की उत्पत्ति के समय आभ्यन्तर प्रयत्न मुख के भीतर ही घटित होते हैं।)
(ङ) आभ्यन्तरप्रयत्नस्य नियमे स्वरेषु ह्रस्वस्य ‘अ’ वर्णस्य स्थानं विशिष्टं मन्यते। (आभ्यन्तर प्रयत्न में सभी स्वरों के बीच ह्रस्व 'अ' को एक विशेष और अनूठा स्वर माना गया है।)
In simple words: यहाँ वर्णों के उच्चारण से पूर्व होने वाली आंतरिक कोशिशों (आभ्यन्तर प्रयत्न), जीभ के छूने के आधार पर प्रयत्नों और स्वरों के विशेष नियमों को समझाया गया है।
Exam Tip: पूर्णवाक्येन उत्तर देते समय व्याकरणिक रूप से सही और स्पष्ट वाक्य रचना का प्रयोग करें ताकि पूरे अंक मिल सकें।
Question 3. अधोलिखितानां वर्णानां क-स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत -
| क-स्तम्भः | ख-स्तम्भः (उचितं मेलनम्) |
|---|---|
| (क) विवृत-प्रयत्नः | (३) ऋ |
| (ख) स्पृष्ट-प्रयत्नः | (५) ध् |
| (ग) ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः | (१) व् |
| (घ) ईषद्विवृत-प्रयत्नः | (२) श् |
| (ङ) संवृत-प्रयत्नः | (४) अ |
Exam Tip: प्रत्येक प्रयत्न के अंतर्गत आने वाले वर्णों की श्रेणियों (जैसे स्पर्श व्यंजनों के लिए स्पृष्ट, अंतस्थ के लिए ईषत्स्पृष्ट और ऊष्म के लिए ईषद्विवृत) को कंठस्थ रखें।
Question 4. अधोलिखितानां वाक्यानाम् उत्तराणि आम् / न इति सन्दर्भानुसारं लिखत -
(क) ‘ई’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति (आम्/न)
(ख) ‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति । (आम्/न)
(ग) ‘झ’ वर्ण: स्पर्शः अस्ति । (आम्/न)
(घ) ‘र’ वर्ण: स्पर्शेषु परिगण्यते । (आम्/न)
(ङ) ‘य, र, ल, व’ वर्णाः ऊष्माणः सन्ति । (आम्/न)
Answer:
(क) न (स्वर 'ई' मूल दीर्घ स्वर है। 'ए, ऐ, ओ, औ' सन्ध्यक्षर की श्रेणी में आते हैं।)
(ख) आम् ('ए, ऐ, ओ, औ' संयुक्त या सन्धि स्वर हैं।)
(ग) आम् ('झ' क-म के बीच स्पर्श व्यंजन वर्ग में च-वर्ग का सदस्य है।)
(घ) न ('र' अंतस्थ व्यंजन वर्ण माना जाता है।)
(ङ) न ('य, र, ल, व' अंतस्थ वर्ण हैं, जबकि 'श, ष, स, ह' ऊष्म वर्ण कहलाते हैं।)
In simple words: यहाँ वर्णमाला के विभिन्न श्रेणियों जैसे दीर्घ स्वर, सन्ध्यक्षर (संयुक्त स्वर), स्पर्श व्यंजन और अंतस्थ/ऊष्म व्यंजनों की सही पहचान के बारे में पूछा गया है।
Exam Tip: 'आम्' (हाँ) या 'न' (नहीं) लिखते समय प्रश्न के मूल व्याकरणिक संदर्भ को समझें और वर्णों के भेद (स्पर्श, अंतस्थ, ऊष्म) का स्पष्ट वर्गीकरण याद रखें।
Question 5. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत -
(क) स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति ।
(ख) व्यञ्जनानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति ।
(ग) स्वराणां द्वौ भेदौ भवतः ।
(घ) ह्रस्वस्य उपभेदाः न भवन्ति ।
(ङ) व्यञ्जनानां चत्वारो भेदाः भवन्ति ।
Answer:
(क) के स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति ?
(ख) कानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति ?
(ग) स्वराणां कति भेदौ भवतः ?
(घ) कस्य उपभेदाः न भवन्ति ?
(ङ) व्यञ्जनानां कति भेदाः भवन्ति ?
In simple words: रेखांकित शब्दों के स्थान पर उचित लिंग, विभक्ति और वचन के अनुसार प्रश्नवाचक सर्वनाम (के, कानि, कति, कस्य) लगाकर प्रश्नों का निर्माण किया गया है।
Exam Tip: प्रश्नवाचक वाक्यों के अंत में हमेशा प्रश्नवाचक चिह्न (?) लगाना सुनिश्चित करें।
Question 6. वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत -
(क) एकस्थानि-वर्णाः:
(ख) स्पर्श-व्यञ्जनानि:
(ग) अयोगवाह-व्यञ्जनानि:
(घ) ऊष्म-व्यञ्जनानि:
(ङ) द्विस्थानि-वर्णाः:
Answer:
(क) एकस्थानि-वर्णाः: अ, इ, उ, ऋ, लृ, क्, ख्, ग्, घ्, ङ् (आदि वर्ण जिनका उच्चारण केवल एक ही स्थान से होता है।)
(ख) स्पर्श-व्यञ्जनानि: क-वर्ग से म-वर्ग तक के सभी २५ व्यंजन वर्ण (क्, ख्, ग्, घ्, ङ्, च्, छ्, ज्, झ्, ञ्, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्, त्, थ्, द्, ध्, न्, प्, फ्, ब्, भ्, म्)।
(ग) अयोगवाह-व्यञ्जनानि: अनुस्वार (ं) और विसर्ग (ः)।
(घ) ऊष्म-व्यञ्जनानि: श्, ष्, स्, ह्।
(ङ) द्विस्थानि-वर्णाः: ङ्, ञ्, ण्, न्, म्, ए, ऐ, ओ, औ, व् (वे वर्ण जिनका उच्चारण दो अलग-अलग उच्चारण स्थानों की सहायता से होता है)।
In simple words: इस प्रश्न में वर्णों को उनके विभिन्न वर्गों (जैसे स्पर्श व्यंजन, ऊष्म व्यंजन, अयोगवाह, एकस्थानि और द्विस्थानि वर्ण) के आधार पर अलग-अलग करके लिखा गया है।
Exam Tip: प्रत्येक वर्ग के व्यंजनों की संख्या और उनके विशेष भेद (जैसे पंचम वर्ण नासिका और अपने वर्ग स्थान दोनों से बोले जाते हैं, इसलिए द्विस्थानि हैं) को स्पष्ट रखें।
पठितावबोधनम् (अनुच्छेद-आधारित प्रश्नोत्तर)
अनुच्छेद 1:
पूर्वस्यां कक्षायां ‘मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया’ कथं भवतीति वयं सामान्यतः दृष्टवन्तः। तत्रैव ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति- (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर प्रयत्नः, च इत्यपि वयम् अवलोकितवन्तः। तत्र (क) षट् स्थानानि; (ख) षट् करणानि इति उभयोः विषये वयं पूर्वस्यां कक्षायाम् एव विस्तरेण ज्ञातवन्तः।
Question 7. (I. एकपदेन उत्तरत)
(1) कस्यां कक्षायां वयं वाग् - उत्पत्ति-प्रक्रियाम् अपठाम?
(2) वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कति तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति ?
(3) आस्यस्य अभ्यन्तरे कति स्थानानि भवन्ति ?
Answer:
(1) पूर्वस्यां (पूर्व कक्षा में)
(2) त्रीणि (तीन)
(3) षट् (छह)
In simple words: इस अंश में पिछली कक्षा में पढ़ी गई वाणी की उत्पत्ति प्रक्रिया, आवश्यक तत्त्वों (तीन) और उच्चारण के छह स्थानों के विषय में एक शब्द में उत्तर दिया गया है।
Exam Tip: अनुच्छेद से सीधे उत्तर खोजते समय सही शब्द और उसकी विभक्ति (जैसे 'पूर्वस्यां', 'त्रीणि') को पहचानें।
Question 8. (II. पूर्णवाक्येन उत्तरत)
(1) वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कानि त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि सन्ति?
(2) किं वयं पूर्वस्यां कक्षायाम् एव विस्तरेण ज्ञातवन्तः ?
Answer:
(1) वर्णानाम् उत्पत्तये स्थानम्, करणम्, आभ्यन्तरप्रयत्नः चेति त्रीणि तत्त्वानि मुख्यानि सन्ति। (वर्णों की उत्पत्ति के लिए स्थान, करण और आभ्यन्तर प्रयत्न - ये तीन तत्त्व आवश्यक हैं।)
(2) पूर्वस्यां कक्षायाम् अस्माभिः षट् स्थानानां तथा षट् करणानां विषये विस्तरेण ज्ञातवन्तः। (पिछली कक्षा में हमने छह उच्चारण स्थानों और छह करणों के बारे में विस्तार से जाना था।)
In simple words: वर्णों के उच्चारण के लिए आवश्यक तीन बुनियादी तत्त्वों और पिछली कक्षा में पढ़े गए उच्चारण स्थानों व अंगों के विस्तृत ज्ञान के बारे में यहाँ पूर्ण वाक्य में उत्तर दिया गया है।
Exam Tip: पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखते समय वाक्य की क्रिया का कर्ता के साथ उचित तालमेल रखें।
Question 9. (III. निर्देशानुसारम् उत्तरत)
(i) ‘आवश्यकानि’ इति विशेषणपदस्य विशेष्यपदं किम् ?
(क) वर्णानाम् (ख) तत्त्वानि (ग) त्रीणि (घ) स्थानानि
(ii) ‘बहिः’ इति पदस्य विलोमपदं अनुच्छेदे किं प्रयुक्तम् ?
(क) अभ्यन्तरे (ख) स्थानानि (ग) विस्तरेण (घ) बाह्य
(iii) ‘दृष्टवन्तः’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
(क) वयं (ख) मनुष्याः (ग) प्रक्रिया (घ) आवाम्
Answer:
(i) (ख) तत्त्वानि (विशेष्य पद 'तत्त्वानि' है, जिसके लिए विशेषण 'आवश्यकानि' प्रयुक्त हुआ है।)
(ii) (क) अभ्यन्तरे ('बहिः' यानी बाहर का विलोम शब्द अनुच्छेद में 'अभ्यन्तरे' यानी भीतर प्रयुक्त हुआ है।)
(iii) (क) वयं ('दृष्टवन्तः' क्रिया का कर्ता पद 'वयं' है।)
In simple words: यहाँ व्याकरण पर आधारित प्रश्न पूछे गए हैं, जैसे विशेष्य-विशेषण की पहचान, विलोम शब्द और क्रिया का कर्ता पद खोजना।
Exam Tip: संस्कृत गद्यांशों में विशेषण-विशेष्य पद समान विभक्ति, लिंग और वचन के होते हैं, जैसे 'आवश्यकानि तत्त्वानि' दोनों नपुंसकलिंग बहुवचन में हैं।
अनुच्छेद 2:
आस्ये विद्यमानानाम् एतेषां स्थान-करण-आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सम्यक्ज्ञानेन, तथा पुनःपुनः अभ्यासेन च वयं प्रत्येक-वर्णस्य एवञ्च सर्वेषां शब्दों सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः।
Question 10. (I. एकपदेन उत्तरत)
(1) केषां ज्ञानं सुस्पष्टोच्चारणे सहायकं भवति ?
(2) वयं कस्य शुद्धमुच्चारणं कर्तुं प्रभवामः ?
(3) केन वयं सुस्पष्टं उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः ?
Answer:
(1) स्थान-करण-आभ्यन्तर-प्रयत्नानाम् (उच्चारण स्थान, करण और प्रयत्नों के ज्ञान से)
(2) वर्णस्य (वर्णों का)
(3) अभ्यासेन (सतत अभ्यास से)
In simple words: वर्णों के शुद्ध उच्चारण के लिए हमें उनके उच्चारण स्थान, सहायक अंग (करण) और आभ्यन्तर प्रयत्न के सही ज्ञान तथा निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है।
Exam Tip: प्रश्नों के उत्तर सीधे गद्यांश से खोजें; विभक्ति का तालमेल (जैसे 'अभ्यासेन' के लिए 'केन') उत्तर को त्रुटिहीन बनाता है।
Question 11. (II. पूर्णवाक्येन उत्तरत)
(1) वयं कथं प्रत्येक-वर्णस्य सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः ?
(2) आस्ये के विद्यमानाः सन्ति , येषां ज्ञानेन वयं शुद्धं उच्चारणं कर्तुं समर्थाः भवामः ?
Answer:
(1) स्थान-करण-आभ्यन्तरप्रयत्नानां सम्यक् ज्ञानेन वारंवारं अभ्यासेन च वयं प्रत्येकवर्णस्य स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं विधातुं शक्नुमः। (उच्चारण स्थान, करण और आभ्यन्तर प्रयत्नों के उचित ज्ञान और निरंतर अभ्यास के द्वारा हम प्रत्येक वर्ण का स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करने में समर्थ होते हैं।)
(2) आस्ये स्थान-करण-आभ्यन्तरप्रयत्नाः स्थिताः सन्ति, येषाम् अवबोधनेन वयं शुद्धं वर्णोच्चारणं कर्तुं शक्नुमः। (मुख के भीतर उच्चारण स्थान, करण और आभ्यन्तर प्रयत्न मौजूद होते हैं, जिनके सही बोध से हम शुद्ध उच्चारण कर सकते हैं।)
In simple words: इस अंश में पूर्ण वाक्यों के माध्यम से बताया गया है कि मुख के विभिन्न अंगों, प्रयत्नों के ज्ञान और निरंतर अभ्यास से हम सभी वर्णों का बिलकुल साफ और शुद्ध उच्चारण कर सकते हैं।
Exam Tip: पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखते समय गद्यांश के मुख्य वाक्य संरचना का उपयोग करें, किंतु कर्ता और क्रिया के वचनों का विशेष रूप से ध्यान रखें।
Question 12. (III. निर्देशानुसारम् उत्तरत)
(i) ‘प्रभवामः’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
(क) एतेषां (ख) वयम् (ग) तेषाम् (घ) युवाम्
(ii) ‘अशुद्धम्’ इति पदस्य विलोमपदं गद्यांशे किं प्रयुक्तम्?
(क) सम्यक् (ख) सुस्पष्टं (ग) शुद्धं (घ) मा
(iii) ‘उच्चारणं’ इति पदस्य विशेषणपदं किम् ?
(क) सुस्पष्टं शुद्धं च (ख) कर्तुं (ग) ज्ञानम् (घ) अशुद्धं
Answer:
(i) (ख) वयम् ('प्रभवामः' उत्तम पुरुष बहुवचन की क्रिया है, जिसका कर्ता पद 'वयम्' है।)
(ii) (ग) शुद्धं ('अशुद्धम्' का विपरीतार्थक शब्द गद्यांश में 'शुद्धं' प्रयुक्त हुआ है।)
(iii) (क) सुस्पष्टं शुद्धं च ('उच्चारणं' विशेष्य है और 'सुस्पष्टं शुद्धं च' उसके विशेषण पद हैं।)
In simple words: यहाँ गद्यांश पर आधारित व्याकरणिक प्रश्नों (क्रिया-कर्ता संबंध, विलोम शब्द और विशेषण-विशेष्य संबंध) के सही उत्तर दिए गए हैं।
Exam Tip: क्रिया उत्तम पुरुष बहुवचन की है (जैसे प्रभवामः), तो कर्ता भी अनिवार्य रूप से उत्तम पुरुष बहुवचन 'वयम्' ही होगा, इस धातु-रूप नियम को याद रखें।
अनुच्छेद 3:
एवमेव ‘वर्णमालायां स्वर- व्यञ्जनयोः मध्ये का भिन्नता?’ इत्यपि यथावत् अवबोधामः। पुनश्च व्यञ्जनानां मध्ये अपि- स्पर्शाः अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहा चेति ये भेदाः सन्ति ; तेषाम् अपि परस्पर- भिन्नताम् यथोचितम् अवगच्छामः।
Question 13. (I. एकपदेन उत्तरत)
(1) वर्णमालायां कयोः मध्ये भिन्नता भवति ?
(2) व्यञ्जनानां कति भेदाः अत्र उक्ताः ?
(3) केषां परस्पर भिन्नताम् अवगच्छामः ?
Answer:
(1) स्वर-व्यञ्जनयोः (स्वर और व्यंजनों के बीच)
(2) चत्वारः (चार भेद - स्पर्श, अंतस्थ, ऊष्म और अयोगवाह)
(3) व्यञ्जनानाम् (व्यंजनों की)
In simple words: वर्णमाला में स्वर और व्यंजन के अंतर को, तथा व्यंजनों के चार भेदों (स्पर्श, अंतस्थ, ऊष्म और अयोगवाह) के पारस्परिक अंतर को इस प्रश्न में समझाया गया है।
Exam Tip: द्विवचन के प्रश्नों में (जैसे कयोः) उत्तर भी उसी वचन में होना चाहिए, जैसे 'स्वर-व्यञ्जनयोः' (षष्ठी/सप्तमी द्विवचन)।
Question 14. (II. पूर्णवाक्येन उत्तरत)
(1) व्यञ्जनानां के भेदाः सन्ति ?
(2) वयम् अनुच्छेदानुसारं किं यथोचितम् अवगच्छामः ?
Answer:
(1) व्यञ्जनानां वर्गे स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहाश्चेति चत्वारः भेदाः समाहिताः सन्ति। (व्यंजनों के भेदों में स्पर्श, अंतस्थ, ऊष्म और अयोगवाह शामिल हैं।)
(2) वयम् अनुच्छेदस्य माध्यमेन व्यञ्जनानां विभिन्नप्रकाराणां परस्परं भेदं यथायोग्यम् अवगच्छामः। (हम इस अनुच्छेद के द्वारा विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के आपसी अंतर को अच्छी तरह समझते हैं।)
In simple words: यहाँ व्यंजनों के मुख्य चार भेदों और उनके पारस्परिक अंतर को सरल संस्कृत और हिंदी में स्पष्ट किया गया है।
Exam Tip: पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखते समय गद्यांश के शब्दों का सही संयोजन करें ताकि उत्तर का अर्थ पूर्ण रूप से स्पष्ट हो सके।
Question 15. (III. यथानिर्देशम् उत्तरत)
(i) ‘अवगच्छामः’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
(क) वयम् (ख) तेषाम् (ग) भेदाः (घ) युवाम्
(ii) ‘अन्योऽन्य’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ?
(क) स्वर (ख) परस्पर (ग) यथोचितम् (घ) दीर्घम्
(iii) ‘अल्पता’ इति पदस्य कः विलोमशब्दः अनुच्छेदे अस्ति?
(क) भिन्नता (ख) भेदाः (ग) अवबोधामः (घ) न्यूनता
Answer:
(i) (क) वयम् ('अवगच्छामः' क्रिया का कर्ता 'वयम्' है।)
(ii) (ख) परस्पर (आपसी या 'एक-दूसरे के' अर्थ में 'परस्पर' पद प्रयुक्त हुआ है।)
(iii) (क) भिन्नता (अनुच्छेद के संदर्भ में 'अल्पता' के लिए 'भिन्नता' विलोम के रूप में प्रयुक्त हुआ है।)
In simple words: व्याकरण के अंतर्गत कर्ता पद की पहचान, 'अन्योऽन्य' के पर्यायवाची शब्द 'परस्पर' और गद्यांश के विलोम शब्द के चयन को दर्शाया गया है।
Exam Tip: पर्याय और विलोम शब्दों का चयन हमेशा गद्यांश के संदर्भ के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
Question 16. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत -
(1) आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति ।
(2) आभ्यन्तर प्रयत्ननः पञ्चविधः भवति ।
(3) करणस्य स्पृष्ट- प्रयत्नेन स्थाने स्पर्श - व्यञ्जनानि उत्पद्यन्ते।
(4) करणस्य ईषद्- स्पृष्ट- प्रयत्नेन स्थाने अन्तःस्थ- व्यञ्जनानि जायन्ते।
(5) करणस्य विवृत - प्रयत्नेन स्थाने स्वराः उच्चार्यन्ते ।
(6) अ-वर्णस्य त्रयः उपभेदाः सन्ति ।
(7) कण्ठ्य-वर्णानां स्थानम् अपि कण्ठः भवति ।
(8) विशेषरूपेण अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) उच्चारणे संवृत-प्रयत्नः भवति ।
(9) अभ्यासेन वयं प्रत्येक वर्णस्य सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः।
(10) केवलं कण्ठ-स्थाने एव संवृत्त - प्रयत्नः भवति ।
Answer:
(1) आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कति तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति ?
(2) आभ्यन्तर प्रयत्ननः कतिविधः भवति ?
(3) करणस्य स्पृष्ट- प्रयत्नेन स्थाने कानि उत्पद्यन्ते ?
(4) करणस्य ईषद् - स्पृष्ट-प्रयत्नेन स्थाने कानि जायन्ते ?
(5) करणस्य विवृत - प्रयत्नेन स्थाने के उच्चार्यन्ते ?
(6) कस्य त्रयः उपभेदाः सन्ति ?
(7) कण्ठ्य-वर्णानां स्थानम् अपि किम् भवति ?
(8) विशेषरूपेण कस्य उच्चा रणे संवृत - प्रयत्नः भवति ?
(9) केन वयं प्रत्येक - वर्णस्य सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः ?
(10) कुत्र एव संवृत्त - प्रयत्नः भवति ?
In simple words: यहाँ रेखांकित शब्दों के लिंग, विभक्ति और वचन के अनुसार उचित प्रश्नवाचक पदों (कति, कतिविधः, कानि, के, कस्य, किम्, केन, कुत्र) का प्रयोग करके वाक्य को प्रश्न में बदला गया है।
Exam Tip: प्रश्न निर्माण के समय रेखांकित शब्द की विभक्ति (जैसे 'अभ्यासेन' में तृतीया विभक्ति है, तो प्रश्नवाचक 'केन' भी तृतीया का होगा) का ध्यान रखें।
Question 17. उचितं मेलनं कुरुत -
| क-स्तम्भः | ख-स्तम्भः (उचितं मेलनम्) |
|---|---|
| स्पृष्ट-प्रयत्नः | स्पर्श-व्यञ्जनानि (क-म) |
| ईषद्-स्पृष्ट-प्रयत्नः | अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (य, र, ल, व) |
| विवृत-प्रयत्नः | स्वराः (अ, इ, उ...) |
| संवृत-प्रयत्नः | ह्रस्व ‘अ’ वर्णस्य उच्चारणम् |
| ईषद्-विवृत-प्रयत्नः | ऊष्म-व्यञ्जनानि (श, ष, स, ह) |
Exam Tip: बाह्य और आभ्यन्तर प्रयत्नों का वर्गीकरण सारणी के रूप में याद रखने से परीक्षा में मिलान करने वाले प्रश्न बहुत सरलता से हल हो जाते हैं।
Question 18. मञ्जूषातः उचितपदानि अवचित्य रिक्तस्थानानि पूरयत -
मञ्जूषा - पञ्चविधः, आभ्यन्तर-प्रयत्नः, त्रीणि, स्वराः, संवृतः, स्पर्श-व्यञ्जनानि, अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि, ऊष्म-व्यञ्जनानि, कण्ठः, बलम्
(क) आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं ............ तत्त्वाणि आवश्यकानि भवन्ति ।
(ख) करणस्य स्थानं प्रति प्रयुक्तं ............ एव ‘प्रयत्नः’ इति कथ्यते ।
(ग) करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, सः ............ इति उच्यते ।
(घ) आभ्यन्तर-प्रयत्नः मुख्यरूपेण ............ भवति ।
(ङ) स्पृष्ट-प्रयत्नेन ............ उत्पद्यन्ते ।
(च) ईषद्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन ............ जायन्ते ।
(छ) विवृत-प्रयत्नेन ............ उच्चार्यन्ते ।
(ज) ईषद्-विवृत-प्रयत्नेन ............ उत्पद्यन्ते ।
(झ) ह्रस्वस्य ‘अ-कारस्य’ उच्चारणे ............ प्रयत्नः भवति ।
(ञ) कण्ठ्य-वर्णानाम् उच्चारणस्थानं ............ अस्ति ।
Answer:
(क) त्रीणि
(ख) बलम्
(ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः
(घ) पञ्चविधः
(ङ) स्पर्श-व्यञ्जनानि
(च) अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि
(छ) स्वराः
(ज) ऊष्म-व्यञ्जनानि
(झ) संवृतः
(ञ) कण्ठः
In simple words: इस प्रश्न में दी गई मंजूषा (सहायक सूची) की सहायता से व्याकरण के नियमों के अनुसार रिक्त स्थानों की पूर्ति की गई है।
Exam Tip: रिक्त स्थानों को भरने के बाद वाक्य को एक बार पूरा पढ़कर देखें कि वह व्याकरण और अर्थ की दृष्टि से सही बैठ रहा है या नहीं।
Question 19. पर्यायपदानाम् उचितं मेलनं कुरुत -
| क-स्तम्भः | ख-स्तम्भः (उचितं मेलनम्) |
|---|---|
| आस्यम् | मुखम् |
| प्रयत्नः | बलम्/उत्साहः |
| ईषद् | अल्पम् |
| विवृतः | उद्घाटितः/विस्तृतः |
| संवृतः | अविस्तृतः/संकुचितः |
| विवरः | छिद्रः/अन्तरावः |
Exam Tip: संस्कृत के कठिन शब्दों (जैसे आस्यम्, विवरः) के पर्यायवाची याद रखने से गद्यांश और पद्यांशों के प्रश्नों को समझने में बहुत आसानी होती है।
Question 20. प्रदत्तपदानाम् एकपदेन लिखत -
(क) मुखस्य आन्तरिकः भागः।
(ख) वर्णानाम् उत्पत्तिस्थानं प्रति प्रयुक्तं बलम्।
(ग) कण्ठात् उपरि मूर्धातः च स्थितं स्थानम्।
(घ) मुखस्य सः भागः यः वर्णोच्चा रणे सहायकः भवति।
(ङ) ईषद् स्पर्शः कृतः।
(च) यस्य उच्चारणं कण्ठस्थाने भवति।
Answer:
(क) आस्यम् (मुख के आंतरिक भाग को आस्यम् कहते हैं।)
(ख) प्रयत्नः (वर्णों की उत्पत्ति के लिए किए जाने वाले बल को प्रयत्न कहते हैं।)
(ग) तालु (कंठ से ऊपर और मूर्धा से नीचे के स्थान को तालु कहा जाता है।)
(घ) करणम् (मुख का वह भाग जो वर्णोच्चारण में सक्रिय रूप से सहायक होता है, करण कहलाता है।)
(ङ) ईषद्-स्पृष्टः (थोड़ा सा स्पर्श किए जाने को ईषद्-स्पृष्ट कहते हैं।)
(च) कण्ठ्यः (जिस वर्ण का उच्चारण कंठ स्थान से होता है, उसे कण्ठ्य कहते हैं।)
In simple words: यहाँ वर्णों के उच्चारण विज्ञान से संबंधित विभिन्न अंगों और क्रियाओं को संक्षेप में पारिभाषिक रूप (एक शब्द) में परिभाषित किया गया है।
Exam Tip: पारिभाषिक शब्दों (जैसे करणम्, आस्यम्) को अच्छी तरह से स्मरण रखें, यह बहुविकल्पीय प्रश्नों में बार-बार पूछे जाते हैं।
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